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महामारी के दौर से गुजर चुके बच्चों के मन की बात सुनें, यह जानना-समझना बहुत जरूरी है कि बच्चों के मन और सोच पर क्या असर हुआ है?

कोई शहर, कोई गांव, मोहल्ला नहीं बचा होगा, जहां कोरोना महामारी ने अपने पैर न पसारे हों। हर परिवार ने घर या पड़ोस में, कोरोना के कहर को झेला है या देखा है। इस पूरे दौर का बच्चों पर क्या असर हुआ होगा? घर-घर में तनाव, परेशानी, दुःख, बेबसी, बच्चों पर इनकी परछाई कैसी पड़ी है? बच्चों ने क्या समझा? क्या सोचा? क्या कोविड के इस दौर से मिले गहरे घावों का असर बच्चों के दिलो-दिमाग पर रह जाएगा? चिकित्सक मानते हैं कि किसी भी संक्रमण का प्रभाव अलग-अलग लोगों में अलग-अलग हो सकता है।

उसी तरह मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि एक ही आपत्ति की प्रतिक्रिया अलग-अलग लोगों में अलग हो सकती है। अस्वस्थ शरीर के संकेत और नापने की विधि आम व्यक्ति भी जानता है। बुखार, ब्लड प्रेशर, शुगर, सांस की गति तो समझ आते हैं, पर मानसिक स्वास्थ्य समझने के तरीके उतने सरल नहीं हैं। आमतौर पर लोग ऐसे विषय से अपरिचित भी हैं।

माथे पर हाथ रखने से आसानी से समझ आ जाता है कि बुखार है या नहीं, पर चिंता, घबराहट, डिप्रेशन, ऐसी बीमारियों का अंदाजा व्यक्ति के व्यवहार के निरीक्षण/अवलोकन से ही लगा सकते हैं। समझ बनाने के लिए धैर्य, कौशल व अनुभव जरूरी है। जब परिवार में सभी परेशानियों व बीमारियों से जूझ रहे हैं, तब बच्चों के मानसिक तनाव का एहसास या व्यवहारिक बदलाव का बारीकी से अवलोकन मुश्किल हो जाता है।

बीस साल पहले की बात है। आपको याद होगा, गुजरात के भुज इलाके में भयानक भूकंप आया था। चंद मिनटों में करोड़ों घर/इमारतें गिर गई थीं। लाखों परिवार बेघर हो गए थे, लगभग 20,000 से ज्यादा लोगों की मृत्यु हुई थी। भूकंप के बाद हमारे कुछ साथी रिलीफ कैंप में बच्चों के साथ समय बिताते थे, उनके साथ विभिन्न गतिविधियां करते थे।

बच्चे बातों-बातों में हादसे का उल्लेख करें या न करें, पर उनकी बनाई गई तस्वीरों में भूकंप का प्रभाव स्पष्ट दिखता था। उदहारण के तौर पर, एक छोटी-सी घटना के बताती हूं… एक छोटे लड़के ने बड़े सफ़ेद कागज के कोने में पेंसिल से बहुत सारे काले-काले गोले बनाए। बहुत पूछने के बाद उसने कहा, ‘यह मेरा घर है। उसको बुलडोज़र साफ़ कर रहा है।’

नवंबर 2016 में दिल्ली के त्रिलोकपुरी मोहल्ले के किसी नगर निगम के प्राथमिक स्कूल में बच्चों के साथ गपशप चल रही थी। तीसरी-चौथी कक्षा की लड़कियां थीं। ‘मेरा परिवार’ विषय पर लेख लिखना था। लिखने के पहले उस विषय पर हम चर्चा कर रहे थे ताकि लिखने में मदद मिले। बातों-बातों में बच्चों ने घर में आजकल क्या-क्या हो रहा है, बताना शुरू किया।

मुझे अभी भी याद है, एक लड़की ने कहा, ‘आजकल पापा बहुत गुस्से में रहते हैं।’ उसके पिताजी ऑटो चलाते थे। ‘क्यों?’ ‘क्योंकि उनको सारा दिन लाइन में खड़े रहना पड़ता है और वे काम पर नहीं जा पाते।’ यह सुनकर कई और बच्चों ने बताना शुरू किया कि आजकल घर पर पैसों के बारे में बहुत बहस हो रही है और अक्सर मम्मी-पापा झगड़ा भी करते हैं।

छोटी-छोटी बातें। मामूली-सी घटनाएं। इनपर गहराई से गौर करें तो ये बच्चों के भीतर की बेचैनी, चिंता, भय और असहजता के संकेत हैं। परिवार हो या पाठशाला, शिक्षक हों या दोस्त, घर के लोग हों या पड़ोसी, हम सब पर एक और बड़ी ज़िम्मेदारी है, महामारी से गुजरे हुए बच्चों के मन की बात सुनें, देखें और समझें।

जो बोल नहीं रहा है, उसके विचार, उसकी सोच, उसकी आशंकाएं, उसके दिल की बात, कैसे सुनी जाए इस पर सोच विचार करें। जो दिखाई नहीं दे रहा है या जो दिखाना नहीं चाहता है, उसे कैसे सहानुभूति और समझ से देखा जाए? हमें ये सीखना होगा। बच्चों के साथ सुकून से समय बिताएंगे तो बच्चे ही हमें आगे बढ़ने का रास्ता भी दिखाएंगे।

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